Tuesday, December 30, 2008

कनुप्रिया

कनुप्रिया धर्मवीर भारती की अनुपम कृति ,आज पुनः पढ़ी.राधा कृष्ण के प्रणय समबन्धो के हर पछ की विशद व्याख्या पढ़के स्त्री पुरूष की अपूर्णता का बोध हुआ .दोनों एक दुसरे के बिना अपूर्ण हैं और दोनों एक दुसरे के पूरक हैं.सभ्यता ने स्त्री और पुरूष के बीच अनेक संबंधो का ताना बना बुना है,लेकिन यथार्थ के धरातल पर गौर करें तो यह प्रतीत होगा की,ये सम्बन्ध केवल उदाहरानात्मक ही है.कुछ सम्बन्ध परिभाषाओ की परिधि के बाहर है.

1 comment:

  1. ....दो आधे-अधूरे वर्तुल है स्त्री-पुरुष......पूर्णता की खोज में जन्म-जन्मान्तर से लगे हुए ...

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