Wednesday, January 7, 2009

मधुशाला का मर्म

आज एक प्रमुख पत्रिका में एक अजीब सी ख़बर पढ़ी.बच्चन जी की मधुशाला को फतवा जारी.उ.प.के एक उलेमा का कहना है की बच्चन की कविताएँ युवाओं में नशे की प्रवृति बढाती है और पाठ्यक्रम में तो शामिल की ही नही जानी चाहिए.लेकिन क्या सच में ऐसा ही है,मुझे तो कत्तई नही लगता। मधुशाला तो शास्वत जीवन का प्रतीक है और इसका प्रयोग केवल प्रतीकात्मक ही है.इस प्रतीक के माध्यम से न जाने कितनी व्यवहारिक बाते की है बच्चन जी ने,केवल मधु और मदिरा के प्रयोग कर देने मात्र से साहित्य अछूत नही हो जाता.इन शब्दों का प्राथमिक अर्थ गौड़ है.मधुशाला का मर्म समझना शायद इस उलेमा के बस की बात नही.ठीक ही कहा है बच्चन ने-मन्दिर मस्जिद बैर कराते ,मेल कराती मधुशाला.यहाँ मदिरालय सिर्फ़ सौहार्दपूर्ण वातावरण वाले शुभस्थान का सूचक है,अन्यथा अर्थान्वयन सर्वथा अनुचित है.बच्चन तो मिटटी के कवि है.उन्होंने परिचय ही दिया है-मिटटी का तन,मस्ती का मन ,छन भर जीवन मेरा परिचय.उनकी रचना को समझाने की जरुरत है न की फतवा जरी करने की.

Tuesday, December 30, 2008

कनुप्रिया

कनुप्रिया धर्मवीर भारती की अनुपम कृति ,आज पुनः पढ़ी.राधा कृष्ण के प्रणय समबन्धो के हर पछ की विशद व्याख्या पढ़के स्त्री पुरूष की अपूर्णता का बोध हुआ .दोनों एक दुसरे के बिना अपूर्ण हैं और दोनों एक दुसरे के पूरक हैं.सभ्यता ने स्त्री और पुरूष के बीच अनेक संबंधो का ताना बना बुना है,लेकिन यथार्थ के धरातल पर गौर करें तो यह प्रतीत होगा की,ये सम्बन्ध केवल उदाहरानात्मक ही है.कुछ सम्बन्ध परिभाषाओ की परिधि के बाहर है.